पितृपक्ष 2017: श्राद्ध में ना करें ये गलतियां नहीं तो भोगना पड़ सकता है नरक

हिंदू धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि शरीर नश्वर है लेकिन आत्मा अजर-अमर है। आत्मा अपना पहला जीवन पूरा करते ही दूसरे जीवन की ओर अग्रसर होती है। इसलिए इंसान के मरणोपरांत धार्मिक क्रियाविधि द्वारा दाह संस्कार किया जाता है। यानि व्यक्ति के मरने के बाद जो संस्कार किया जाता है उसे श्राद्धकर्म कहा जाता है।

वेदों में ये मान्यता है कि मानव तीन ऋण लेकर पैदा होता है जिनमें देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण शामिल है।

 प्रतिवर्ष भाद्रपत की पूर्णिमा से लेकर अश्विन मास की अमावस्या तक 16 दिन तक पितृपक्ष माना जाता है। यानि 5 सितंबर 2017 दिन मंगलवार से पितृपक्ष शुरू है। इन दिनों लोग 16 दिनों तक अपने पितृ के प्रति श्राद्ध भाव से धार्मिक कर्म करते हैं। जो व्यक्ति पितृ के निमित्त श्राद्ध कर्म नहीं करते हैं उनसे पितृलोग नाराज हो जाते हैं और श्रापित करे देतें हैं जिससे व्यक्ति के जीवन में दुखों और कठिनाईयों का आगमन शुरू हो जाता है। आमजन की भाषा में इसे ही पितृदोष कहा जाता है।

पितृ पक्ष में श्राद्धकरने वाले को पान खाना, तेल लगाना, क्षौरकर्म, मैथुन व पराया अन्न खाना, यात्रा करना, क्रोध आदि नहीं करने चाहिए। वरना पितृगण नाराज होकर श्रापित भी करते हैं।

पितृ पक्ष में या फिर पितरों के श्राद्ध के समय यथाशक्ति ब्राह्मणों को खाना खिलाएं। या फिर किसी ब्राह्मण को आटा, फल, गुड, शक्कर, सब्जी आदि की दक्षिणा दें। अगर कोई गरीब व्यक्ति अपने पितरों का श्राद्ध करने में आर्थिक रूप से सम​र्थ नहीं है तो उसे किसी पवित्र नदी के किनारे जाकर जल में काला तिल डालकर तर्पण करना चाहिए।

या फिर ब्राहमण को एक मुटठी काले तिल का दान करें। पितरों को यादकर गाय को हरा चारा खिलाने से भी पितृदोष में कमी आती है। इस प्रकार उपरोक्त उपाय कर अपने पितृदोष का यथाशीघ्र निवारण करें।

पितृ यानि हमारे मृत पूर्वजों का तर्पण करवाना हिन्दू धर्म की एक बहुत प्राचीन प्रथा व पर्व है। हिन्दू धर्म में श्राद्ध पक्ष के सोलह दिन निर्धारित किए गए हैं ताकि आप अपने पूर्वजों को याद करें और उनका तर्पण करवा कर उन्हे शांति और तृप्ति प्रदान करें, जिससे आपको उनका आर्शीवाद और सहयोग ‍मिले।

जिस माता, पिता, दादा, दादी, प्रपितामह, मातामही एवं अन्य बुजुर्गों के लाड, प्यार, श्रम से कमाएं धन एवं इज्जत के सहारे आप सुखपूर्वक रहते हैं, तो आज जब उनका शरीर पांच तत्व में विलीन हो गया है तो आपका यह परम कर्तव्य बनता है कि अपने पितरों के लिए कम से कम और कुछ नहीं कर सकते तो तर्पण तो कर दें।

यदि आप अपने ‍माता, पिता, पितामह और परदादा आदि के प्रति असम्मान प्रकट करते हो तथा उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य करते हो तो आपको पितृदोष को झेलना ही होगा।

1. वंशानुगत : किसी भी प्रकार का शारीरिक अपंगता, रोग या मानसिक विकार आनुवांशिक हो सकता है।

– अर्थात वंश क्रम में कोई रोग या अवांछनीय गतिविधि होती चली आ रही हो। इस वंशानुगत दोष को दूर करने के लिए आयुर्वेद और अथर्ववेद में लिखे उपाय किए जाते हैं।

2. अवंशानुगत : अवंशानुगत का अर्थ है कि पितृ लोक के पितृ आपके धर्म-कर्म से रुष्ठ हैं इसलिए उनके कारण आपके जीवन में तरह-तरह के कष्ट होते रहते हैं जैसे : –

1. संतान बाधा : या तो संतान नहीं होगी, लेकिन  यदि संतान है तो संतान से कष्ट बना रहता है।

2. विवाह बाधा : यदि कुल-खानदान में कोई पुत्र है तो उसके अविवाहित बने रहने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

3. स्वास्थ्य बाधा : परिवार में किसी अदृश्य एवं चिकित्सकों की पहुंच से बाहर का कोई रोग हो। पूरा इलाज होने के बावजूद रोग ठीक नहीं होता हो।

4. पारिवारिक बाधा : गृह कलह से मानसिक शांति भंग हो जाती है।  पूरा परिवार बिखर जाता है। परिवार के किसी भी सदस्य की आपस में नहीं बनती। सभी एक-दूसरे का अपमान करते हैं। रिश्तेदारी से भी सभी दूर हो जाते हैं।

5. अर्थ बाधा : लगातार आर्थिक नुकसान होता रहता है। व्यक्ति का धंधा, नौकरी और कारोबार नहीं चलता।

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