जानिए क्यों बकरीद पर दी जाती है बकरे की कुर्बानी

ये तो आप भी जानते होंगे कि साल में दो बार दो ईद मनाई जाती हैं, लेकिन आपको बता दें कि ये दोनों ही ईद अलग-अलग तरह से मनाई जाती हैं. ईद सिर्फ हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम देशों में मनाई जाती है.

रमजान के बाद ईद-उल-फितर मनाई जाती है और उसी के 70 दिन बाद ईद-उल-जुहा का त्योहार मनाया जाता है, जिसे बकरीद भी कहते हैं. ये तो सभी जानते हैं कि बकरीद पर मुस्लिम बकरों की कुर्बानी देते हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर कैसे ये रीति शुरू हुई और क्यों बकरीद पर बकरों की कुर्बानी दी जाती है.

क्यों बकरीद के दिन दी जाती है बकरे की कुर्बानी

इस्लामिक मान्यताओं की माने तो दुनिया में 1 लाख 24 हजार पैगंबर (खुदा के संदेशवाहक) आए. इन्हीं में से एक थे पैगंबर हजरत इब्राहिम हुए और ऐसा माना जाता है कि इन्हीं के जमाने में बकरीद की शुरूआत हुई.

इस्लाम के मुताबिक, अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेने के लिए उन्हें अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देने का हुक्म दिया था. हजरत इब्राहिम को लगा कि उन्हें सबसे प्यारा तो उनका बेटा है इसलिए उन्होंने अपने बेटे की ही बलि देने का फैसला किया। हजरत इब्राहिम को लगा कि कुर्बानी देते समय उनकी भावनाएं आड़े आ सकती हैं, इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी।

लेकिन जब कुर्बानी देने के बाद उन्होंने अपनी आंखों पर से पट्टी हटाई तो देखा कि उनका बेटा जिंदा है और उनके सामने जिंदा खड़ा है। उन्होंने देखा कि बेटे की जगह दुम्बा (साउदी में पाया जाने वाला भेंड़ जैसा जानवर) पड़ा हुआ था, तभी से इस मौके पर कुर्बानी देने की प्रथा है।

खास बात यह है कि कुर्बानी के लिए किसी भी बकरे का इस्तेमाल नहीं किया जाता. कुर्बान किया जाने वाले बकरे को कोई बीमारी ना हो, उसकी आंखें, सींघ या कान बिल्कुल ठीक हो, वह दुबला-पतला ना हो. यही नहीं, बकरा बहुत छोटी उम्र का हो तो भी उसकी बलि नहीं दी जा सकती. दो या चार दांत आने के बाद ही उसकी कुर्बानी दी जाती है.

एक बात और ध्यान देने वाली बात यह है कि बकरीद पर बकरों की बलि कभी भी नमाज से पहले नहीं दी जाती. कुर्बानी हमेशा नमाज के बाद ही दी जाती है. ऐसी मान्यता है कि नमाज के पहले दी गई कुर्बानी को अल्लाह स्वीकार नहीं करते

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